Friday, February 4, 2011

नाचती बोतल, ऐ साकी, नशा, महखाना

१. नाचती बोतल

कल एक
शराब की बोतल को
नाचते हुए देखा था
नहीं पता
उसने पी थी कि नहीं
मगर उस पर चढ़ी दीवानगी
जता रही थी कि
जरुर पिया होगा उसने
कोई गम का घूँट....!!!


२. ऐ साकी

ऐ साकी,
तू सभी को
पिला पिलाकर शराब
अब बूढी हो चली है
गर तुझे फिर जवान होना है
तो आ
बैठ मेरे साथ
लबों से लब मिलाकर
दर्द पी.....!!!


३. नशा

तेरे आर्द्र होंठ
होठों पर मुस्कराहट की शबनम
शबनम पर चढ़ी शराब
इस नशे में भला
कौन नहीं डूबना चाहेगा...!!!

४. महखाना

कल महखाने में
भीड़ बहुत थी
वो भी आये थे
जिन्हें नहीं पीने का शौक
नशा खुद बेहोश था
पूरा मदिरालय मदहोश था
पर मैं पी रहा था
साकी के हाथों से छीनकर
अश्क,
शराब की जगह...!!!

Sunday, January 30, 2011

बिल्ली चली हज़ पे...

(इस बार कुछ बच्चों के अंदाज़ में सोचने का प्रयास करते हैं....पेश है एक बहुत छोटी सी कहानी, जो आधारित है एक बहुत पुरानी कहावत पर-'सो चूहे खाकर बिल्ली हज पे चली').........

दिवाली की शाम. बिल्ली भूखी प्यासी एक पेड़ के नीचे कोने में बैठी थी. बैठी बैठी बड़ बड़ा रही थी - ये इंसान भी कितने बुरे होते हैं! खुद तो मीठे मीठे व्यंजन खा रहे हैं और हमें पूछते भी नहीं... कमबख्त सुबह से एक चूहा भी नहीं मिला. खाना तो दूर, नाश्ता तक नहीं हुआ आज.

उसने शरीफ जैसा मुह बनाकर एक सीधे साधे चूहे को अपने पास बुलाया. प्यार से उसके सर को सहलाते हुए बोली-और!!! चूहे भैया, कैसे हो???

ठीक हूं.., चूहे ने जवाब दिया.

पर तुम कैसी हो मौसी? उसने पूछा.

ठीक हूं भैया........(सांस छोड़ते हुए बिल्ली बोली). पर अब तुमसे क्या छुपाऊं.....!! ये तुम्हारी मौसी पाप कर कर के बहुत थक गई है. चूहे मारकर अब और पाप की भागी नहीं बनना चाहती. सोच रही हूं हज की यात्रा कर आऊं तो सारे पाप धुल जायेंगे. फिर बस शाकाहारी भोजन ही करुँगी. बस एक छोटी सी समस्या है.....(कहते हुए बिली ने धीरे से चिंता की मुद्रा में मुंह लटका लिया).

बोलो मौसी!! हम हैं ना, तुम्हे चिंता करने की क्या जरुरत है??? (चूहा मन ही मन मुस्कुराते हुए बोला).

अरे भैया....... मेरी सारी जमा पूँजी अभी पिछले दिनों ही चोरी हो गई, जाऊं तो कैसे जाऊं??????

तो चिंता क्यों करती हो मौसी???? बस दो दिन दो, हम सब इन्तज़ाम कर देंगे....

ठीक है भैया, चल अब जा, आराम कर....वरना मुझ बुढ़िया के पास तेरा मन भी नहीं लगेगा....

चूहा ख़ुशी से उछलता, उचकता, फुदकता हुआ भागता है....अरे मोटे वाले...!  अरे पतले वाले...! अरे लम्बी पूँछ वाले...! अरे खाऊ...! सब के सब कहाँ हो?? एक मस्त खबर लेकर आया हूं यार.... सारे के सारे चूहे इकट्ठे हो गए. शोर मचाने लगे.....क्या हुआ??? क्या हुआ????

अरे तुम्हे पता है???? बिल्ली मौसी हज पे जा रही है. अब हम सब मस्त रहेंगे और रोज़ खुले आम डांस करेंगे....हमें खाने का खतरा भी ख़त्म हो जाएगा. सारे चूहे ख़ुशी से झूम उठते हैं.....ईई यीईईईए य़ायायाया!!!!!........पर यार बेचारी के साथ एक समस्या है..उसका पर्स अभी चोरी हो गया. उसके पास रुपये नहीं बचे.

क्यों ना हम सब मिलकर चन्दा इकठ्ठा करके बिल्ली मौसी को दे दें, लम्बी पूछ वाले ने सुझाव दिया.

सभी चूहों ने पूँछ हिलाकर बात से सहमति जताई. साथ में यह भी निश्चय हुआ की मौसी की विदाई डांस और गीतों के साथ की जाए.

कुल मिलाकर आठ आने का चन्दा इकठ्ठा हुआ, मौसी को दे दिया गया... उसकी विदाई की भी तैयारी की गई. बिल्ली को सभी चूहों ने मिलकर हमाम साबुन से नहलाया. उसे माला पहनाई गई. मूंछो पर इत्र लगाया गया और गले में एक सुन्दर सा मफलर टांग दिया गया. बिल्ली के जाने की तैयारी हो गई... धीरे धीरे बिल्ली ने चलना शुरू किया....सारे चूहे नाचने गाने लगे. मोटा चूहा गाने लगा....ना जा.....!! तू कहीं अब ना जा....!!! आशिकाना चूहा बिल्ली की नाक पर बैठकर फुदकने लगा....बिल्लो रानी....!! कहो तो अभी जान दे दूं........!!! कोई कर रहा था बल्ले बल्ले और कोइ धिन्चक धिन्चक धिन. ... चूहों का भांग का नशा लगभग चढ़ चुका था और मदमस्त होकर नाच रहे थे.....बिल्ली का दस कदम चलते ही मन बदल गया और एक एक करके सारे चूहों को मारकर खा गयी. सिर्फ दो चूहे जिंदा बचे जिन्होंने नशा नहीं किया था...बस दोनों आपस में यही चर्चा कर रहे थे.......देखलो भैया नतीजा...!!! बुरे आदमी की बात पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए.......!!!!




Sunday, January 9, 2011

अक्ल, शिकवा, दौड़, धर्म की किताबें, रातें, शरारत

1. अक्ल

थोड़ी सी अक्ल का बोझ
मैं ढोता रहा
अक्ल डालती रही पर्दा
मेरी आँखों के आगे,
किसी के दिल में झाँकने के लिए
मुझे चश्मा लगाना पड़ता है
अब और नहीं सहा जाता
खुदा,
तू अपनी अक्ल वापस ले ले...!!!

2. शिकवा

गैरों की खताओं का क्या कोई शिकवा करते,
हमें तो अपनों के हाथों क़त्ल होना था...!!!

3 . दौड़

मैं गुलदस्ते की जगह
टिकट लेकर दौड़ा
तब तक ट्रेन होर्न बजा चुकी थी
मैं कुछ स्थान पा पाता
उससे पहले ही
पिछड़ गई थी
मेरी दौड़...!!!


4 . रातें 


तेरी बाहों में 
रहते रहते
यूँ ही गुज़र गईं कई रातें 
आज डर लगने लगा है
कहीं सूरज
कल फिर से ना उग आये...!!! 
 

5 . शरारत 


जानता हूं 
तू शरारत नहीं करती
पर यदा कदा
तेरा हया से पलकें झुका लेना
अमावस  ला देता है...!!! 

Monday, November 29, 2010

कुछ लिखना, बदलियाँ, मासूमियत, कोई अनकहा अध्याय, असली पन्ना, प्यार जताना, मेरे जज़्बात, होठों के निशाँ

dedicated to my special someone Q.........

१. कुछ लिखना

तू चाहती थी कि
मैं लिखूं तुझ पर कुछ
पर पाता हूं खुद को असमर्थ
कि तुम
जो खुद एक किताब हो
उसके पन्ने पलटते पलटते
खुद मैं खो जाता हूं
पर हाँ, इतना लिखना काफी है
कि मेरी ज़िन्दगी की किताब के
मुखपृष्ठ पर छपी तेरी आँखें
डूबने के लिए काफी हैं!!!

२. बदलियाँ

बेशक सूख चुकी हैं
मेरी आँखे
लेकिन देखकर
कल की तेरी भीगी आँखें
और आज कि तेरी याद से
बरस पड़ी मेरी आँखों से
बदलियाँ!!!


३. मासूमियत

कल देखी थी तेरे
चेहरे की मासूमियत
अब अगर मेरी ऑंखें
देखने में धोखा खा जाये
तो भी
मुझे मंज़ूर है!!!

४. उसूल

कुछ तो हम नादाँ थे
कुछ कुसूर था तेरी मासूमियत का
वक्त यूँही गुज़रता गया
हम उसूल निभाते रहे.!!!

५. कोई अनकहा अध्याय

तेरी कलम को मैंने
कहीं छुपा कर रख दिया है
डरता हूं कहीं
ये फिर से ना लिख दे
कोई अनकहा अध्याय!!!

६. असली पन्ना

हवा के झोंखे पलटते रहते हैं
मेरी ज़िन्दगी के पन्ने
मैं हमेशा कि तरह उधेड़बुन में
उलझा रह जाता हूं
और हर बार
पढने से छूट जाता है
ज़िन्दगी का एक
असली पन्ना!!!

७. प्यार जताना

तुने मुझे सिखाया है
बोलना, सोचना
महसूस करना
अब प्यार करना और
जताना भी सिखा दे!!!

८. मेरे जज़्बात

कल तुने कहा था-
मैं उतना परिपक्व हूँ नहीं
जितना समझता हूं
तुने सही कहा है
शायद इसीलिए
हर बार क़त्ल हो जाते हैं
मेरे जज़्बात
मेरे ही हाथों!!!

९. होठों के निशाँ

तू जाते जाते
छोड़ गई थी गिलास पर
अपने होठों के निशाँ
मैं भी पी गया था फिर
उसी गिलास से पानी
अब किसी और से पीना
फीका फीका सा लगता है!!!

Tuesday, November 23, 2010

हाँ, ठीक है!

प्रेमिका खाती कितने भाव
चाल-चाल में बात-बात में
नयन नखरे अठारह करती
प्रेमी बेचारा फिर भी बोले
हाँ, ठीक है!

प्रेमिका देती नाना नाम
उल्लू, नीबू, फटीचर
करेला, घोंचू, घनचक्कर
प्रेमी बेचारा फिर भी बोले
हाँ, ठीक है!

जब प्रेमिका सामने होती
प्रेमी की जुबाँ गायब रहती
कुछ ना बोले बस सुनता जाये
प्रेमिका जोर जोर से चिल्लाये
प्रेमी बेचारा फिर भी बोले
हाँ, ठीक है!

प्रेमी की बात एक ना माने
महारानी सा ऑर्डर मारे
प्रेमी कभी चैन से सोले
प्रेमिका भड़के बोले,
स्टैंड - अप!
प्रेमी बेचारा फिर भी बोले
हाँ, ठीक है!

पर प्रेमिका का इन्साफ तो देखो
अपने दिल और दिमाग को खोलो
कभी अगर तुमने आंख दिखाई
बोले, रिश्ता तोड़ो!
प्रेमिका झट बोल पड़ेगी
हाँ, ठीक है!!!

Friday, November 19, 2010

दायरा

दुनिया मै आने के साथ ही
मुझे आवश्यकता थी
ज्ञान की
कि दी जा सके
सही मायनों में शिक्षा
आँख और कान खुलने के साथ ही
दिलवाया गया प्रवेश
स्कूल और कॉलेज में.

ताकि बढ़ सके दायरा
सही और सार्थक दिशा में
मेरी सोच और अभिलाषाओं का
ज्ञान पाकर कुछ दे सकूँ
पुनः इस संसार को
समझूँ सामाजिक सरोकारों को.

परन्तु ज्ञान के साथ साथ मिले
भांति भांति के लोग
मेरी अभिलाषाएं
अवांछित इच्छाओं में बदल गईं
विमुख हो गई दिशा
नहीं रही व्यावहारिकता.

जीवन चलाने के लिए
जरुरी थी एक नौकरी
वो मिली भी
परन्तु मैंने भुला दिए
शिक्षा के सही मायने
संसार के प्रति अपने दायित्व.

अब बस उड़ता हूं
मिथ्या कल्पनाओं में
सपनो में देखता हूं
एक बड़ा सा महल
बड़ा ही बैंक बैलेंस
और एक खुबसूरत स्त्री का साथ

बस यही रह गया है
मेरी शिक्षा और सोच का
दायरा!

Wednesday, September 1, 2010

जश्न, शर्त, ग़ज़ल, बादलों की जरुरत, क़र्ज़

1.  जश्न

मैं
हर उस ख़ुशी का
जश्न मनाने से डरता हूं
जिसे
खोना नहीं चाहता...!!!


२.   शर्त

तू कहे तो
मैं अपनी
हर ख़ुशी पर
तेरा नाम लिख दूँ,
शर्त यह है
कि तू
तेरे किसी गम में
मुझे
भागीदार बना ले..!!!


३.   ग़ज़ल

चाहता हूं
तेरी हर अदा पर
ग़ज़ल कहूँ
मगर मेरे लफ़्ज़ों में,
तुझ जैसी खूबसूरती कहाँ..!!!


४. बादलों की जरुरत

भोर की
पहली किरण के साथ ही
आज देखली सबने
तेरे गेसुओं की घटाएं,
तो बरसने के लिए
बादलों की
कहाँ जरुरत है भला...!!!


५. क़र्ज़

तेरे लबों से
मांगी थी उधार
थोड़ी सी मुस्कुराहट
आज तक
अदा नहीं कर पाया,
ब्याज भी
तेरे क़र्ज़ का....!!!