Tuesday, November 19, 2013

अज्ञान (क्षणिका)

अज्ञान,
ज्ञान के लिए
उतना ही महत्व्पूर्ण है
जितना
अज्ञात,
ज्ञात के लिए
और शून्य,
ब्रह्माण्ड के लिए!!! 

Sunday, November 17, 2013

चलना है यारों

(वर्ष २००५ में लिखी एक कच्ची कविता जो अभी तक अधूरी है। फिर भी लुप्त होने से बचाने  के लिए पोस्ट कर रहा हूँ )

सफ़र है बहुत लम्बा
पर चलना है यारों
कोई साथ  चले न चले,
अकेले ही  कदम बढ़ाना है यारों।

समय दौड़ेगा सतत
अकेला, अमूर्त, फिर भी मजबूत
प्रहर आठ पूरे  मिले न मिले,
पर चलना है यारों।

पथ होगा पथरीला कंटीला,
लोग कहें चलना हमारी भूल
पर रेगिस्तान में गंगा लानी है तो
नंगे पैर भी चलना है यारों।

यह ठोस आधार नही कि
कोई गया नही  कभी उस तरफ
गर रचना है इतिहास तो,
प्रथम बार चलना है यारों।  

Monday, October 7, 2013

क्षणिकाएं

१. 
मुझे ऊँचाई पर चढ़ने का 
बहुत शौक था 
ऊंचाई पर पहुंचा तो पाया 
वहाँ,
"पर" काम नहीं करते!

२. 
करने वाला कुछ 
ग़लत नहीं करता 
अच्छा या बुरा यह,
ज़माना तय करता है!

३. 
अवसर देता दस्तक 
हर द्वार-हर घर 
कुछ पहचान लेते हैं 
कुछ कहते हैं,
बाद में आना!

४. 
किनारों का वजूद नदी से है 
नदी का किनारों से 
किनारे फ़र्ज़ अदा करते हैं 
नदी वक्त निकलने पर 
बिगाड़ देती है!

Thursday, August 1, 2013

​टांग थ्योरी :) (व्यंग)

​बस अभी पंद्रह मिनट पहले की ही बात है. बरसात के बाद सिन्धु घाटी सभ्यता कालीन दिखती सड़कों, जिस पर गड्ढों में पानी और कीचड जम जाता है,​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​  मैं पैर साधते हुए और पाजामा बचाते हुए गुज़र ​​​​रहा था​.   तभी एक महानुभाव दुपहिया  फटफटिया फर्राटे से दौडाते हुए निकल ​​ गये, मानो शोएब अख्तर से तेज़ सड़क पर उड़ना  चाहते हों​​. विज्ञान के सिद्धांत के मुताबिक ​​ कीचड उछलकर मेरे एक ​​​पैर के पायजामे पर  काले रंग से दुनिया के छोटे बड़े देशों ​​​​​​​ के मानचित्र बना  गया ​​. एक पैर की सफेदी और दुसरे पैर की रंगीन पिच को देख दस कदम दूर खड़े होकर  वही महानुभाव ​​​​​​​​ मंद-मंद मंदबुद्धि जीव की तरह मुस्कुरा रहे​​​  थे. मुस्कुराएंगे भी क्यूँ नहीं?​​​​  दूसरों पर कीचड उछालने ​  में आनंद लेना​  तो मानव का प्रथम मौलिक कर्तव्य है. 
​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​
​ मैंने उसकी जले पर नमक छिड़कती हंसी पर आत्म नियंत्रण करते हुए उनसे पूछ ही लिया-बंधू! आपने मेरी एक ही तो टांग खराब  की है, दूसरी भी सलामत है और पूरा बदन  भी​​. फिर सिर्फ एक टांग पर ही ​जिद्दी दाग लगाकर क्यूँ मुस्कुरा रहे हो?

​महानुभाव ने फ़रमाया-जनाब! मैं आपकी टांग की दुर्दशा पर नहीं, टांग थ्योरी पर मुस्कुरा रहा हूँ​. आप भी सुनेंगे ​ तो गुस्सा  थूंक ​देंगे। ​ मैंने कहा- फरमाइए! क्यों ​ न शुरुआत आप ही से की जाए !​ महानुभाव बोले ​ -जनाब ​!टांग थ्योरी पवार का प्रतीक है. जिसकी जितनी मजबूत  टांग वह उतना ही पावरफुल। अगर आपकी टांग मजबूत है तो आप कहीं भी टांग अड़ा सकते हैं. अच्छे -​ ​​​​  खासे धावक​ को गिरा​ सकते हैं​. जो आपसे पीछे है उसे टांग लगाकर  रोक सकते ​हैं​. टांग  की बदौलत ही ओलम्पिक जैसे नामी ​ खेलों में पदक जीते जाते है. टांग से ही क्रिकेट में नो बॉल फेंककर आप मैच गंवा सकते ​ है. आपकी एक टांग न हो तो विकलांग का दर्जा  पाकर अच्छी नौकरी पा​​​​​​​​ सकते है. टांग उचित आकर की हो तो ब्रांडेड जूता पहन​ सकते हैं और मौका मिलने पर वही जूता आपके किसी पसंदीदा नेता की दिशा में फेंककर प्रसिद्ध​ हो सकते है. और तो और घोडा भी जब बिदकता है तो​​​ टांग से ही​ प्रहार करता है और आदमी भी  सारे अस्त्र -​​श​स्त्र  असफल ​रहने पर लात ही मार​ता है. टांग​ की बदौलत ही आदमी ​अच्छे ​​से अच्छे​  रिश्ते ठुकरा देता है और​​​​ उसी टांग से ठोकर खाकर गिर पड़े​​​ तो अपने दांत तुडवा सकता है. तो टांग को कमजोर​ न समझें​. आप इसी पर  अच्छी​ तरह टिकें और अच्छी तरह​​​​​ टिकने के लिए दोनों टाँगे​​​​ मजबूत हों​ तो आप सौभाग्य शाली है. देश को भी दोनों टांगो (पक्ष-विपक्ष) के बीच अच्छे​ तालमेल की जरुरत है वरना एक टांग के  भरोसे रहने पर लडखडाने ​​​​की संभावना ज्यादा है. रेस में जीतने के  टांगो से तेज़ दौड़ना पड़ेगा​. टांग वहीं अडाई​​ जाये जहां आवश्यकता है. टांग अड़ाकर​ दुसरे को गिराने और उसी टांग से ठोकर खाकर गिरने में सभी का घाटा​ है. तो जनाब आप भी अपनी टाँगे मजबूत बनाएं​. टाँगे संभलकर रखें ताकि वहाँ काम ली जा सके जहाँ जरुरत है. 

​​महानुभाव की बात मेरी समझ में आ गई​. अब जब भी चलता हूँ, ​गुन्गुनाते हुए चलता हूँ ​-एय भाई! जरा देख के चलो…आगे ही नहीं पीछे भी। …. ऊपर​​ ही नहीं नीचे भी ​… ​।और कीचड का क्या? पूछ लेता हूँ फिर चिपका लेता हूँ। ।भाइयों​! यह टांग है बड़े काम की चीज़ ​…इसे बचाकर चलिये… कल काम आयगी,  कहीं अडाने में कहीं चलाने मे….:)​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​ ​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​:):)  ​

​​​​​​​​

Tuesday, July 23, 2013

धर्म समाज को जोड़ता है या तोड़ता है?



वर्तमान दौर में लोग धर्म के नाम पर बंटे ह्युए है. जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के नाम पर लोगो ने अपने आपको बाँट लिया है. समाज ने खुद को पहले धर्मं के नाम पर अलग अलग किया, फिर जातियों के नाम पर, फिर उपजातियों के नाम पर. फिर उसमे भी गौत्र के नाम पर, और भी  कई तरह से धर्म के नाम पर समाज ने अपने बीच दीवारें चुन लीं और ऊंच - नीच छोटे-बड़े का भेद पैदा कर लिया.   धीरे धीरे यह स्थिति आज भयावह हो गई है, जहां आतंकवाद धर्म का ही परिणाम है. वहीं आज धर्म  के नाम पर ही तुच्छ राजनीति  होने लगी है. कहीं मंदिर मस्जिद के लिए समाज को  तोडा जाता है, कहीं जातिगत आरक्षण के नाम पर. यहाँ तक कि समाज ने जाति - सम्प्रदाय के नाम पर अपने पूजा स्थल भी कालांतर में अलग अलग कर लिये.

परन्तु, यथार्थ में देखा जाए तो समाज का खंड खंड होना धर्मं का परिणाम नहीं है. विडंबना यह रही है की लोगों ने धर्म को तो अपनाया लेकिन धर्म के मर्म को नहीं. समाज ने धर्म का अन्धानुकरण किया. धर्म में जो सन्देश लिखा है उसे समझने की किसी ने कोशिश नहीं की बल्कि हर व्यक्ति ने उसकी अपने ढंग से, अपनी सुविधानुसार, अपने दृष्टिकोण से व्याख्या की है. व्यक्ति ने धर्म को  उसी तरह समझा, जैसा उसने समझना चाहा और उसे   लेकर कट्टर बन गया जो कि निश्चित रूप से संकीर्ण मानसिकता का ही परिणाम है.

वरना, धर्म ग्रंथों ने तो सदा ही मानव जाति को एक समझा. एक ही परमात्मा को सबका रचनाकार बताया है. "वासुधैव कुटुम्बकम" जीवन का सूत्र रहा है. धर्मो ने जीवन के  तरीके बताये हैं . अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग बताये हैं. धर्मो का उद्देश्य हमेशा  जोड़ना रहा है. आवश्यकता इस बात की  है कि समाज के हर तबके को शिक्षित बनाया जाए  ताकि  बुद्धि का विकास हो सके और वो धर्म को उन्ही अर्थों में समझें ,   जिन अर्थों में उन्हें लिखा गया है. धार्मिक कट्टरता के स्थान पर  आवश्यकता है एक धार्मिक चेतना की ताकि धर्मो का सार ग्रहण किया जा सके. धर्म के मर्म और परमात्मा के सन्देश को सही अर्थों में समझा  जा सके.  तभी समाज आपस में जुड़ेगा, टूटेगा नहीं. सिर्फ एक इश्वर होगा और एक ही धर्म होगा और एक ही जाति होगी-मानव जाति. और जीवन का सूत्र होगा-"वासुधैव कुटुम्बकम". 


Tuesday, January 22, 2013

सामाजिक स्थिति और चिंतन


वर्तमान दौर में अक्सर देखा जा रहा है कि लोग समाज की बुराइयाँ गिनाते रहते हैं। कोई पुरुष प्रधान होने की बुराई गिनाता है कोई स्त्री केन्द्रित होने की, और कोई भाषा, वेशभूषा, रहन - सहन, में आते बदलाओं की। परन्तु सिर्फ बुराइयां देखने के साथ साथ समय के अनुसार जरुरी बदलाओं पर भी गौर किया जाना चाहिए। अठारवीं सदी के विचारों पर ही बढे चले जाना किसी भी स्थिति में उपादेय नहीं है। निश्चित रूप से इक्कीसवीं सदी के भारत में समाज में आमूल चूल बदलाव आये हैं जहां स्त्रियों ने अपनी क्षमताओं को सिद्ध किया है। वहीं कुछ बदलाव प्रशंसनीय नहीं रहे विशेष तौर पर पहनावे में बदलाव और डिस्क जाना आदि। परन्तु इसे भी पूरी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता क्यूंकि किसी न किसी परिवेश में इसे स्वीकार भी किया जाता है। निश्चित रूप से पाश्चात्य संस्कृति को ग्रहण करने में कोई बुराई नहीं है बशर्ते वो नैतिक मूल्यों को बनाये रखे। दुनिया में कुछ भी बुरा नहीं है अगर हम उसे अच्छी नज़र से देखें। सबकी नज़र अच्छी रहे इसके लिए पुरुष हो या स्त्री समय और परिवेश के अनुसार उसे ढाल लेना चाहिए। यह भी सत्य है की युवा सिर्फ वही करना चाहते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है, इसमें भी कोई बुराई नहीं है परन्तु इस बिंदु पर बहुत अधिक सावधान और मर्यादित होने की आवश्यकता है। मर्यादाएं निर्धारित करने का भी कोई मापदंड नहीं है और जहा कोई पैमाना न हो वहाँ वह किया जाना चाहिए जो समाज में व्यापक रूप से स्वीकार्य हो और अपनी संस्कृति के अनुसार हो। वर्तमान परिदृश्य में समाज को सही दिशा में ले जाने के लिए हमे सार्थक चिंतन की आवश्यकता है। ऐसे विचार अपनाये जाने चाहिए जो समाज को बिना भटकाए सही दिशा में ले जाये। जो कुछ खुलापन हो, मर्यादित हो। नैतिक मूल्य बढ़ें। आवश्यकता है की युवा और सम्मान नीय अनुभवी  व्यक्तित्व मिलकर वैचारिक क्रांति लायें। समाज में शिक्षा का प्रसार किया जाये। लोगो की मानसिकता बदलने का प्रयास किया जाए। वैचारिक क्रांति ही समाज का उत्थान कर सकती है , कोई संगठन या आन्दोलन नहीं।

Monday, January 14, 2013

दर्द किससे कहूं?

तुमसे पहली मुलाकात
फिर उसके बाद
बार बार मिलना
सुबह, शाम, दोपहर
जब जी चाहे सम्मुख होना।

आहिस्ता-आहिस्ता
मोहब्बत हो गई मुझे
हर उस जगह से
जहां तेरे कदम पड़ते थे
मेरे साथ साथ। 

उन हवाहों से
उन खुशबुओं से
उस मौसम से
उस आसमान से
जो हमने महसूस किया था
साथ साथ।

यहाँ तक कि अब तो
वो हर घडी भी
धड़कने बढ़ाती हैं
जिस क्षण
तुम मेरे सम्मुख होती थी।

मिलने की वो उत्सुकता
वो पागलपन
कि तुम
जब बुलाता,
चली आती थी
और मैं करने लगता
इंतज़ार और इंतज़ार।

अब, जब तुम जा रही हो
तो मैं तुझे खोने का दर्द
न सह सकता हूँ
न किसी से कह सकता हूँ।

तुम समझो मेरी पीर
तुम्हे रोम रोम में बसाया है
मेरी हर साँस,
तुमसे ही ज़िंदा है। 

प्रेयसी!

ये दर्द मैं
किसी को बयां नहीं कर सकता
दूसरों को कहूँगा तो
खिल्ली उड़ायेंगे लोग,
मेरी मोहब्बत की
तुझसे कहूँगा तो तू,
अहंकारी हो जाएगी!!!